Saturday, August 29, 2009

बोरियत की इन्तहा

क्या लिखूं यार? कुछ है ही नही लिखने को. दिमाग का दही होगया है यहाँ पड़े पड़े. आज तीन-चार घंटे के लिए अकेला भटक रहा था मैसूर मेंबाई गोड कहाँ फँस गया मैं! कोई दिल्ली में नौकरी दिलवा दो यार प्लीज़मन नही लग रहा यहाँ पर अबएक महिना है अभी घर जाने में, जल्दी से ख़तम हो बसएक हफ्ता ही सही, घर तो घर है

Note: If you can't read this then don't worry. Nothing worth reading anyway. Later.

2 comments:

kritika said...

sid !!!! how can u be sooo vella !!!!!!!!!!!

Unknown said...

vella? how do u mean?

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